तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गई हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गई है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकांत... Read More →
तुमसे अलग होकर तुमसे अलग होकर लगता हैअचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं,और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ।अब कहीं कोई यात्रा नहीं है,न अर्थमय, न अर्थहीन;गिरने और उठन... Read More →
चाँदनी की पाँच परतें(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) चाँदनी की पाँच परतें,हर परत अज्ञात हैएक जल में,एक थल में,एक नीलाकाश मेंएक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,एक मेरे बन रहे विश्वास मेंक्या कहूँ, कैसे कहूँकितनी ज़रा-... Read More →
लोहे की रेलिंग (नरेश सक्सेना) थोड़ी-सी ऑक्सीजन और थोड़ी-सी नमी वह छीन लेती है हवा से और पेंट की परत के नीचे छिपकर एक ख़ुफ़िया कार्रवाई की शुरुआत करती है एक दिन अचानक एक पपड़ी छिलके-सी उतरती ह... Read More →
आईना (गुलज़ार) ये आईना बोलने लगा है,मैं जब गुज़रता हूं सीढ़ियों से,ये बातें करता है- आते जाते में पूछता है"कहाॅं गयी वह फतुई तेरी--ये कोट नेक-टाई तुझ पे फबती नहीं,ये मसनूई लग... Read More →
काँक्रीट(नरेश सक्सेना) आपस में सट कर फूटी कलियाँ एक दूसरे के खिलने के लिए जगह छोड़ देती हैं जगह छोड़ देती हैं गिट्टियाँ आपस में चाहे जितना सटें अपने बीच अपने बराबर जगह ख़ाली छोड़ देती... Read More →